Detachment & Practice | Starbanquet

Detachment & Practice

Posted by Rahul Minhas on December 8, 2018 at 4:05 pm filled under Uncategorized Category

एक दुसरे के मन की बातें जानने पर, ऐसा महसूस होता है, जैसे सबके पास, कोई न कोई परेशानी की वजह, हमेशां मौजूद रहती हो,

लेकिन यह, आभास असत्य है, पूर्णतया भ्रम है, इसको अब मूल से समझना होगा ।

इस सृष्टि का निर्माण, चैतन्य और जड के संयोग से हुआ है, ये दोनों इस प्रकार संयुक्त हैं कि इसकी भिन्नता का बोध सामान्य जन को नहीं पाता, यही अविद्या है,

चैतन्य स्वरूप मानव स्वयं दृष्टा है, और जड स्वरूप प्रकृति दृश्य, इस अदभुत संयोग से ही, चित्त का सृजन हुआ है, फिर शरीर, इन्द्रियों के साथ बुद्धि, अँहकार की संरचना हुई,

एक नवजात शिशु पर अगर पहले चार वर्ष की आयु तक दृष्टि रखें तो पायेंगे कि एक दिन का नन्हा बालक, नाम, जाति, धर्म, सम्प्रदाय, देश की सीमाओं से अन्जान है, और अनन्त ब्रहमाँड में रहते हुये, अपने परम आनन्द में मग्न है,

माता पिता द्वारा नाम दिये जाने के बाद, वह उस नाम के दायरे में बँधने लगता है, अपनों को पहचान कर अपनों-परायों में, भेद करने लगता है, फिर धीरे धीरे खिलौनों के मोह में पड कर हँसने रोने लगता है,

यहीं से घर, परिवार, मित्रों के संस्कारों की, मन पर गहरी छाप पडने लगती है, और उम्र बढते बढते, ये अच्छी बुरी छाप इतनी गहरी हो जाती है कि फिर शख्सियत का अहम भाग बनकर निकलती है, और अहम को हर स्तर पर लगातार पुष्ट करती है, दृढ करती है

इस तरह, यह अविद्या, मन को इन्द्रियों के द्वारा, सांसारिक भोगों में लिप्त करती है, जिससे अनेक वृत्तियां जन्म लेती हैं,

इन वृत्तियों के निषेध से, मानव इन्द्रियों के इस जाल से मुक्त होकर चैतन्य स्वरूप में स्थित हो जाता है, और हमेशां हमेशां के लिये इस चक्रव्यूह से बाहर निकल जाता है,

इसलिये सदा, दृष्टा स्वरूप में रहकर, एक कुशल मूर्तिकार की तरह, अपने चित्त की वृत्तियों पर, छैनी और हथौडे का लगातार प्रयोग करते करते, सभी अवगुणों को जड से हटाना होगा, और उसे अपने,बाल सुलभ, शुद्धतम रूप में लाना होगा,

और यह केवल वैराग्य और अभ्यास से ही संभव है

आप सबको मेरा प्यार भरा नमस्कार 🌼🌸

राहुल मिन्हास 🙏🏻