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Continue your Duties without attachment

Posted by Rahul Minhas on November 29, 2018 at 3:52 pm filled under Uncategorized Category

अपने परमगुरु तोतापुरी द्वारा ब्रह्मज्ञान मिलने के बाद, अन्त में, राम कृष्ण परमहँस जी, अपने ईष्ट “माँ काली” के मोह से भी मुक्त होकर, अनन्त  परमब्रह्म में विलीन होने से भी तब तक ही रुके हुये थे जबतक उन्होने, पाँच इंद्रियों में से, किसी एक बन्धन को पकड रखा था, और वो था जीभ के स्वाद का,

जब भी खाना पकता, वो सुगन्ध आते ही, झट से पत्नी के पास रसोई में पहुँच जाते, और खाना चखने को आतुर हो जाते, एक बार इस उतावलेपन से परेशान होकर पत्नी ने उलाहना दिया कि इस स्तर पर आने के बाद, आपसे इस व्यवहार की उम्मीद तो कोई भी न करेगा,

तब ही उन्होने इस रहस्य का खुलासा किया, कि जिस दिन खाना पकते हुये, मैं रसोई की और न दौडूँ, तो समझ लेना कि, जन्म मरण से इस चक्र से मुक्त होकर,, उस अनन्त में विलीन होने के लिये, मैं हमेशां के लिये, जा चुका हूँ,

और एक दिन यही हुआ, जब खाना पकते हुये, जब कोई न आया, और न ही कोई आहट हुई, तब पत्नी फूट फूट कर रोई,

अगर सत-चित-आनन्द, परमपिता परमात्मा से साक्षात्कार हो चुका है, तो 99% परिस्तिथियों में तो शरीर छोडना ही होगा, और नहीं तो, फिर कोई न कोई बहाना तो कायम रखना ही पडेगा ।

इसलिये मन नहीं टिक रहा हो, तो भी सँसारिक कर्तव्यों के पूर्ण होने तक किसी न किसी सँसारी चीज से मोह बनाये रखना ही उचित है,

आप सब को मेरा प्यार भरा नमस्कार

राहुल मिन्हास